दिल्ली चलो....
एक हफ्ता कैसे गुजर गया इंदौर आये कुछ पता भी नहीं चला। अपनों के बीच रहने का यह करिश्मा ही है की एक दिन एक सेकंड सा लगता। ऐसा लगता है जैसे कल ही तो मैं रात की ट्रैन पकड़ कर दिल्ली की भागदौड़ वाली जिंदगी को पीछे छोड़ आया था। राखी का त्यौहार कारण पूरा स्टेशन परिषर खचाखच भरा हुआ था। हजारों के भीड़ पर फिर भी जब तक मैं वहां रहा, एकाकीपन में ही खुद को पाया। कितना अजीब है ना कि आपक के चारो और लोगों का झुण्ड हों, चिलपिल मची हो, सही से पैर रखने की जगह ना हो, पर फिर भी आपको हर वक़्त अकेलापन लगे। दिल्ली है ही ऐसी जनाब। ये उस ट्रैन के डिब्बे की तरह है जहाँ चाहे आप जितनी भी हासिठिठोली कर ले, गप्प मार ले, रोटी सब्जी का आदान प्रदान कर ले, प्यार के वादे काली रात के उन झिलमिलाते तारों पर लगा दे, स्टेशन जैसे ही आता है, कदम अपने आप बाहर की और चल देते है। और सब कुछ पीछे ही छूट जाता। निजाम्मुद्दीन स्टेशन से आगे बढ़ने पर मैंने खिड़की से बाहर की और देखा और पलक झपकते ही दिल्ली पीछे रह गया।
मुझे नींद नहीं आ रही थी। घर जाने की उत्सुकता ही ऐसी थी की आँखें बिलकुल तारो ताजा महसूस कर रही थी। खैर जैसे तैसे सवेरा हुआ और ट्रैन ने मध्य प्रदेश में प्रवेश किया। नागदा पहुंचने पर मैंने नियमपूर्वक मुंह धोया और अपने पर्स से 40 रूपए लेकर अपने मनपसंदीदा पोहा और श्रीखंड खरीदा। सन्न 2009 से मेरा यही नियम है। नागदा स्टेशन का आना मेरे अंदर ख़ुशी का संचार कर देता है। क्यूंकि इसका मतलब अगला स्टेशन उज्जैन, उसके बाद देवास और फिर अपना घर इंदौर। यहाँ से मात्र तीन घंटे में मैं अपने माँ बाप और बहनों के बीच होगा, उन लोगों के साथ होगा जिनके साथ मैंने अपना बचपन, अपना हर सुख दुःख बाटा।
पर लीजिये अब ठीक विपरीत दिशा में चलने का समय आ गया। यह यात्रा मुझे सबसे दुखदायी लगता है। जैसे ही ट्रैन इंदौर के बाहरी इलाकों को पीछे छोड़ते हुए देवास की और लपकती है, मन हल्का भारी और आँखें गमगीन हो जाती। परसो यहाँ से जाते समय यक़ीनन मुझे एक बार इस एहसास से दो चार होना पड़ेगा। दिल्ली की गर्मी और भागती जिंदगी का हिस्सा बनाना होगा। माप बाप के सुखद छाए से बाहर निकल उस अजनबी दुनिया में जीना होगा।
खैर जिंदगी का नाम ही चलते रहना है।