Tuesday, August 11, 2015

पत्र

मित्र रुसो;
भारत मे रहते हुए एक साल से भी ज्यादा समय बीत गया लेकिन अभी भी यह विशाल देश मुझे हर पल आचर्यचकित करता रहता हे।  जितना अधिक कोशिश मे इस देश को समझने का प्रयास करता हूँ उतना ही अधिक मे अपने आपको असहाय पाता हूँ।  मेरी यह नाकामी मुझे दूसरो की कामयाबी के बारे मे शंकित करती है जिन्होंने कुछ सौ पन्नो मे भारत की विशालता और विविधिता को समझाना और दूसरों को समझना चाहा। कई समाजशास्त्री, लेखकों ने बड़ी बारिकता से दुनिया की विभिन्न समाज का वर्णन किया है, ऐसे मे  प्रश्न यह उठता है की जब वो इस नामुमकिन से लगने वाले को काम को इतनी बखूबी कर सकते है तो मे क्यों नहीं? आखिर फ्रांस की अठारवीं शताब्दी को तुमने और मैंने मिलकर एक नयी दिशा दी थी। अंधकार और सामाजिक जंजीरो मे बंधे देश को हम लोगों ने रौशनी की नयी किरण दिखाई थी।

फिर आज मुझे यह दिक्ततों का सामना क्यों करना पड़ रहा  है। क्या वाकई मै अपनी सारी काबिलियत खो दी ? ये सारे ख़याल मुझे डराते है ? रुसो तुमने भी तो एक आदर्श समाज के बारे मे लिखा था।  अब तुम ही मेरी मदद कर सकते हो मगर उससे पहले मुझे अपनी कमजोरी को ढूंढ निकालना होगा।  खुशनशिबी यह है की यह डर मेरे भीतर मौजूद है, बाहर समाज मे नहीं।

पहले मे तुमको अपनी समस्या विस्तार मई बताता हूँ। जब मै दिल्ली आया, तो मैं कुछ सरकारी कर्मचारियों से मिला क्यूंकि मुझे लगा की उनसे अच्छा कौन मुझे भारत के बारे मे अवगत करा सकता है। तो मैं सीधे राष्ट्रपति भवन के दक्षिण मे स्थित विशाल भवन मे पहुचा। काफी विनती, आग्रह और जांच के बाद मैं अंदर कदम रख पाया।  कोई बात नहीं। बड़े बड़े देशो मे तो ऐसे छोटी छोटी बातें होती रहती है रुसो। पत्र